Published On:Monday, December 9, 2013
Posted by NJFI media
अब स्वंय का मार्केटिंग अनिवार्य
उज्जैन। सच्चा भारत समाप्त और कारपोरेट इन्डिया अस्तित्व में। कारपोरेट व्यवस्था में सफलता हेतु मार्केटिग महा मुनाफे हेतु भ्रष्टाचार, गवन, घोटाले व दलाली अनिवार्य होता है। कारपोरट को संस्कार, सभ्यता, देश, समाज, विधान संविधान अभिसमयों, नेतिकता, सत्य,इ्रमान से कोई सरोकार नहीं होता। उसे तो मात्र लाभ चाहिए। भारतीय राजनीति ीाी कारपोरेट वादी हो गई है। कारपोरेट स्पष्ट कहते है सफल होना है तो स्वंय का कुशलता पूर्वक माकेटिंग करा। मार्केटिंग का सबसे अच्छा माध्यम कारपोरेटस के ई एवं पी मीडिया प्रतिष्ठान हं माकेटिग को राजनैतिक दल मीडिया मैनेजमेंट के नाम से ही पुकारते है। म.प्र., छग, दिल्ली व राजस्थान में चुनाव परिणाम आये। छग व म.प्र. में दलों ने अपना माकेटिंग खूब किया। शिवराज व रमनसिंह ने पीछे नहीं रहे। शिवराज तो विगत दस वर्षो से स्वंय का माकेटिंग कर रहे है,रमनसिंह का भी यही हाल ह। मोदी ने तो 2 से 3 हजार करोड रूपये स्वंय के माकेटिंग हेतु व्यय काप्रावधान रख छोडा है। दिल्ली में शीला दीक्षित पीछे रही आप ने भी स्वंय का माकेटिंग अण्णा आंदोलन से ही शुरू कर दियाथा। मिजारम के मुख्यमंत्री का विश्वास माकेटिग में नहीं, इस कारण वे मीडिया की सुर्खी में नहीं राजस्थान में अशोक गहलोत ने अच्छे काम किए जनता की सवा भी कि, किन्तु अपने कार्मो की मार्केटिंग याने मीडिया मैनेजमेंट नहीं कर पाये, इस कारण उन्हें निराशा की स्थिति में आना पडा अब हर कार्य के लिए कारपोरेट मीडिया के माध्यम से स्वंय का माकेटिग अनिवार्य हो गया है। अब तो सत्ता और प्रजातंत्र भी कारपोरेट छाप हो गया है। कारपोरेट मीडिया के धनखोर खूनी जबडे में देश व प्रदेश के जनकोष का खून डालना अनिवार्य हो गया है। यदि धन पिपासू दतों को रक्त नहीं पिलाया तो वे जहर की वर्षा कर देगे। यह बात राजस्थान के निराश पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत को बहुत देरी से समझ आई। मोदी की तरह कारपोरेट मीडिया को अपनी माकटिग का ठका दे देते तो मोदी की तरह, गेहलोत ही गहलोत नजर आते मीडिया में आंशिक व अधूरी माकेटिंग से व्यवसाय चैपट होता है व धन भी बर्बाद होता हैं।
कारपोरेट इन्डिया में सब कुछ मार्केटिंग पर ही निर्भर है। वह समय भी आ चुका है कि आने वाली सन्तानों हेतु स्वंय का माकेटिंग करना अनिवार्य हो जायेगा। नव संस्कृति विधा और अभिसमय हेतु किसे पूजे, किसे धिक्कारे। जब धन ही ईश्वर, पूजा, आराधना, चरित्र व्यवहार, व्यक्ति और आदमी ही हो जाए तो भावनाएॅं भी विमुख हो जाती हैं। हवन करते हाथ जलते है, कुछ कहने पर शब्द ही शत्रु हो जाते है। सच तो यह है कि सब कुछ उल पुलटा हो गया है आदमी का विवेक अब शीर्षण की स्थिति में चल रहा है। कारपोरेट इन्डिया का यह चरित्र भविष्य का प्रजातंत्र स्वप्न व अस्तित्व रेख बन रहा ह।


