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Published On:Friday, February 14, 2014
Posted by NJFI media

देश की हत्या, हत्यारे कौन?


देश की कू्रर हत्या हुई, उसक शव पर ढका तिरंगा, देशवासियों से पूछ रहा है कि हत्यारे कौन है, किन्तु सभी की जुबान पर ताले है, य़द्यपि हत्यारे का संज्ञान सभी को है। कोई भी अपनी जुबान नहीं खोल रहा, सभी अपने आप से डरे हुए है, उन्हें भय सता रहा है की कहीं वे भी देश की हत्या के षडयत्रों मं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार तो नहीं है। यह आत्मिक भय स्वाभाविक ही है। देश के हत्यारे अतिविचित्र विहगम रूप व स्वरूप में है, उनके चेहरों पर अनेकानेक राजनतिक, सामाजिक बौद्धिक अनेक राजनैतिक, सामाजिक बौद्धिक आर्थिक, औद्योगिक नौकरशाही आध्यात्मशाही आर्थिक, औद्यागिक, नौकरशाही, सेवाशाही के मुखौटे लगे है, उनका असली शतानी छुपा हुआ है। देश के हत्यारे अति कुटिल, चालाक, अहंकारी, पूर्वाग्रही, नाटक नौटंकी बोज रूप व स्वरूप परिवर्तनी अपना अपना रंग बदलने में सिद्धहस्त है, उनके शरीर में लाल नहीं सफेद खून प्रवाहित हो रहा है उनके पंख भी उगे हुए है वे आकाश में उडते है, जमीन पर तेज गति से दौडते है और स्वंय की रक्षा हेतु जमीनों में छेद कर छुपते है हत्यारे, कफन व तिरंगे के आकर्षक गणवेश पहनते है, अपने सिर पर सफेद, काली लाल हरी, पीली, नीली व बहुरंगी टोपी और टोप पहनते है, साफे व पगडी तक बना कर पहनते है देश के शव को टोंच टोच कर खाने हेतु दो टांगों वाले जन्तु भी बन जाते है। सभी हत्यारे विकास, देशभक्ति, सेवा, लोक उद्धारक आध्यात्मि, कल्याण, संस्कृति, सभ्यता एवं सुसंस्कारों के ठेकेदार भी बनते है। राजनीति, उद्य़ोग, धन, भ्रष्टाचार, घोटाले कुचरित्र दोहरा दोगला पन हिंसा, हत्याएं षडयंत्रों नाटक नौटंकी पूर्वाग्रह अहंकार उनका चरित्र विधान संविधान, नीति नियत व सुसंस्कार होता है। ये सभी कुटिल षडत्रों में सिद्ध हस्त होत है और अपने अपने हत्यारे षडयंत्रों में सभी को भागीदार बनाते है ताकि उनके खिलाफ कोई मुंह न खोल सके। देश की हत्या के दो गिरोह है 20 प्रतिशत सम्पन्न व 80 प्रतिशत वंचितों का। सभी देश के हत्यारे है, इसी कारण सभी के मुंह पर ताले हैं।
देश की हत्या शातिर ढंग से की गई है असली हत्यारों का गिरोह 20 प्रतिशत सम्पन्नों राजनेताओं दलो, नेताओ, पॅंूजीपतियों, कालेधन कुबेरों, विदेशी ताकतों के गुलामों कारपोरेट जगत और कलम व कैमरे बैचने वाले संवाद सैनिकों तथा बुद्धि जीवियों का है जो अपनी आत्मा, भावना, लेखनी, चिन्तन व निर्णय बेच रहे है। दूसरा गिरोह 80 प्रतिशत वंचितों का है जो हत्यारों के लोभवादी षडयंत्रों कुटिल चालों में अपनी विवेकहीनता, निरभक्षताक्षणिक, स्वार्थपूर्ति के चक्कर में, हत्यारे के षडयंत्रों का भागीदार स्वेच्छा से बनता है, उनका स्वागत करता है, उनका प्रचार करता है 20 प्रतिशत का गिरोह है जिसने देश की समस्त सुव्यवस्थाओं को कुव्यवस्थाओं में बदला है, अपने अपने स्वार्थ सिद्ध किए है स्वंय को ताकतवर व शक्तिपुष्प बना कर विधान, संविधान को कुचला है और रंच मात्र की हड्डियों के टुकडे फंके कर, 80 प्रतिशत वंचितों को अपना बंधुवा मजदूर बनाया है, इसी कारण उनकी जुबान पर ताले है और हत्यारों की पालकी उठाने को बेबस व साध्य है। 80 प्रतिशत क्रांति सोच, विचार तक खा चुकेा है, गहन तिमिर में जी रहा है। वह स्वंय को पहचानने अक्षम है, इसी कारण देश के हत्यारां के शातिर षडयत्रों में शरीक है। देश की शातिर ढंग से हत्या, 20 प्रतिशत के सुसंगठित आतंकी गिरोह ने की है। सबसे पहले सत्ता पर एकाधिकार जमाया, भ्रष्टाचार अन्याय, शोषण, विकास, सेवा के नाम पर खूब धन कमाया, कालेधन कुबेर हो गए है। देश के सभी प्राकृतिक संसाधनों उद्यागों को शातिर ढंग से बेचा, धनकुबेरों व उद्योगपतियों व कारपोरेट जगत को। कोल ब्लाक, मेगनीज लोह, अयस्क, दाने, लाइम व अन्य खदाने पॅंूजीपतियों को उपहारों में दी, उन्होंने बहुआयामी दोहन किया सरकारों व नौकरशाहों को धन व भ्रष्टाचार द्वारा अपना बंधुवा मजदूर बनाया। देश के क्र्लक के जन्मदाताओं को खूब ंचदा दिया मनमाने कानून व नियम बनवाये, सभी जाॅंचे प्रभावित की संसद में हंगामे करवाये और दलों, नेताओं, संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों के ठेकेदारों को अपना बंधुवा व मुखौटा बना कर सत्ता अपहरण के षडयंत्र रचे। वे षडयंत्र अभी भी जारी है स्थिति का लाभ विदेशी ताकतों ने उठाया देश में कुव्यवस्था अराजकता, हिंसा व दंगे करवाये छोटे-‘छोटे राज्य बनवाये, अब भारत को तोडना उनका सपना है और वे दस्तक द रहे है अपने षडयंत्रों को संवाद की संज्ञा दे रहे है। स्वदेशी आतंकी भी उन्हीं के जाल में है। उद्धारक मसीहा सभी हत्यारें हैं।
दूसरा गिरोह 80 प्रतिशत वंचितों का है जो पूर्ण रूपेण सर्वहारा वर्ग नहीं है। उसमें कुछ आर्थिक धनपति व भूमिपति है। 80 प्रतिशत गिरोह 20 प्रतिशत हत्यारों के खेमे दलों में बटे हुए है और उनकी ही जुबानों के स्वर में अपने स्वर मिलाते हत्यारों ने 80 प्रतिशत वंचितों का चरित्र भी अपने समान ही बना दिया है। वह मुक्त, विवेकहीनता, निरक्षरता, लोभ क चक्कर में अपनी आत्मा चिन्तन, सोच, विचार, क्रान्तिभाव तक भूल चुका है और हत्यारों की आरती उतार रहा हैं उनकी पालकी उठा रहा है उनका सम्मान कर अपना जीवन धन्य कर रहा है, उनके खिलाफ गवाह देने को तैयार नीं। अपना विश्वास सत्य तक धन, शराब व लोभ में बेच रहा है देश के हत्यारों का साक्षी कौन बने, उनके नाम कौन बताये।
देश की सबसे बडी विडम्बना यही है राजा ओैर रंक का चरित्र ही हत्यारे स्वरूप में हो गया है। तिरंगे का दर्द, मर्म, व आवाज सुनने वाली कोई नहीं। देश के शव पर सब अपने अपने ढंग से जश्न मना रहे है और तिरंगे को अपने हाथों का रूमाल बना रहे है।

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