Published On:Tuesday, February 4, 2014
Posted by NJFI media
भ्रष्टाचार, घोटाले, उन्माद राष्टीय अभिसमय क्यों?
उज्जैन। हमारा भारत अब देश नहीं भीड भरा भूखण्ड हो गया। इससे आगे इस भूखण्ड का नकारात्मक विकास भी हुआ। भीड भरा भूखण्ड अब महा मक्कारों व धूर्तो की भीड भरा भूखण्ड हो गया हैं। विकास तो हुआ है चाहे वह नकारात्मक हो या सकारात्मक, प्रत्येक देशवासी चाहे आप में महामक्कार व धूर्त ही नजर आ रहा है। इस नकारात्मक विकास से तो अच्छा था कदराओं में हरने वाला आदिम आदमी। क्योंकि वह मूर्ख, मक्कार, धूर्त, स्वार्थी व धनखोर नहीं था। अपने अंदर विद्यमान उर्जा का सकारात्मक विकास व संरचना में ही करता था और यदाकदा ही कदराओ से बहार निकलता था।
वर्तमान में भी हम अपने अपने सीमेन्ट क्रांक्रिट, घास, फूंस रूपी जंगलों झोपडियों से प्रतिपल उन्मुक्त वातावरण में घूमते है अपने मकान रूपी कदंराओं को घर बनाने की बजाय भ्रष्टाचार घोटाले, धनखोरी, मिलावट, छल, कपट, विश्वासघात, धोखा धडी, ठगी, शातिर व फूहड अपराध तस्करों उन्माद कुमार्ग सर्व अपमानक, अहंकार, पाखण्ड धूर्तता मक्कारी, श्रम चोरी, धार्मिक उन्माद, हिंसा अफवाह एक दूसरे पर लांछन आरोप, प्रत्यारोप एवं विवेकहीनता केा राष्टीय सामाजिक परावारिक एवं व्यक्तिगत अभिसमय बनाते हैं। हम स्वंय में संवेदनहीन होने पर गर्वित होते है। शवों पर बैठ कर शव साधना, श्रेष्ठ साधक बनाकर, शाही भोज, भोग और रोग को अपनी जीवन विधा कला बनाते हैं। महानिंद्रा को महादैविक वरदान और चमत्कार मानते है। हम स्वंय में अति विकृत प्रदूषित, घिनौने महामक्कार, धूर्त, कुटिल, चतुर चालक होने पर हर्षित व गर्वित होते है। हम सब महामक्कारों व धूर्तो का एक महागेंग बन गई है। मूर्ख, महामूर्ख, विद्वान, महाविद्वान तथा कथित मसीहा, उद्धारक, सभी एक जाजम व एक धांगे में सजे हुए मक्कारी व धूर्तता के फूल हैं। हमने धन को अपना साध्य बना लिया है जो कभी साधन हुआ था। धन विकृति को अपना गर्व विकास, सम्पन्नता, सम्मान, दैविक, उपहार चमत्कार तथा महानिंद्रा को जीवन की सर्वश्रेष्ठ शिखर मान रहे है। अपनी अपनी आत्मा व विवेक सूर्य, आत्मा अपनी हथेली पर रख अति स्वाद से खाने को अपनी जीवनयात्रा लक्ष्य, अपना विकास, अपनी आराधना, इबादत, प्रार्थना मानते है। यथार्थ में हम आदमी नहीं, विक्षिप्त जानवर हो गए हैं और एक दूसरे को उन्माद पूर्वक खाने में नहीं हिचकते है। मत्स्य न्याय के पक्षधर हो गए है। भीड भरे भूखण्ड के घिनौने जन्तु। देश के प्रत्येक नागरिक को हर प्रकार की समस्याओं के समाधान हेतु सच्चा उपवासी आत्मचिंतक तथा अपने आप में विवेक द्वीप बनना अनिवार्य है तब ही भारत अपन प्राचीन एवं गौरवमयी अस्तित्व के पद पर महाशक्ति के रूप में पुनः स्थापित हो सकेगा।
वर्तमान में भी हम अपने अपने सीमेन्ट क्रांक्रिट, घास, फूंस रूपी जंगलों झोपडियों से प्रतिपल उन्मुक्त वातावरण में घूमते है अपने मकान रूपी कदंराओं को घर बनाने की बजाय भ्रष्टाचार घोटाले, धनखोरी, मिलावट, छल, कपट, विश्वासघात, धोखा धडी, ठगी, शातिर व फूहड अपराध तस्करों उन्माद कुमार्ग सर्व अपमानक, अहंकार, पाखण्ड धूर्तता मक्कारी, श्रम चोरी, धार्मिक उन्माद, हिंसा अफवाह एक दूसरे पर लांछन आरोप, प्रत्यारोप एवं विवेकहीनता केा राष्टीय सामाजिक परावारिक एवं व्यक्तिगत अभिसमय बनाते हैं। हम स्वंय में संवेदनहीन होने पर गर्वित होते है। शवों पर बैठ कर शव साधना, श्रेष्ठ साधक बनाकर, शाही भोज, भोग और रोग को अपनी जीवन विधा कला बनाते हैं। महानिंद्रा को महादैविक वरदान और चमत्कार मानते है। हम स्वंय में अति विकृत प्रदूषित, घिनौने महामक्कार, धूर्त, कुटिल, चतुर चालक होने पर हर्षित व गर्वित होते है। हम सब महामक्कारों व धूर्तो का एक महागेंग बन गई है। मूर्ख, महामूर्ख, विद्वान, महाविद्वान तथा कथित मसीहा, उद्धारक, सभी एक जाजम व एक धांगे में सजे हुए मक्कारी व धूर्तता के फूल हैं। हमने धन को अपना साध्य बना लिया है जो कभी साधन हुआ था। धन विकृति को अपना गर्व विकास, सम्पन्नता, सम्मान, दैविक, उपहार चमत्कार तथा महानिंद्रा को जीवन की सर्वश्रेष्ठ शिखर मान रहे है। अपनी अपनी आत्मा व विवेक सूर्य, आत्मा अपनी हथेली पर रख अति स्वाद से खाने को अपनी जीवनयात्रा लक्ष्य, अपना विकास, अपनी आराधना, इबादत, प्रार्थना मानते है। यथार्थ में हम आदमी नहीं, विक्षिप्त जानवर हो गए हैं और एक दूसरे को उन्माद पूर्वक खाने में नहीं हिचकते है। मत्स्य न्याय के पक्षधर हो गए है। भीड भरे भूखण्ड के घिनौने जन्तु। देश के प्रत्येक नागरिक को हर प्रकार की समस्याओं के समाधान हेतु सच्चा उपवासी आत्मचिंतक तथा अपने आप में विवेक द्वीप बनना अनिवार्य है तब ही भारत अपन प्राचीन एवं गौरवमयी अस्तित्व के पद पर महाशक्ति के रूप में पुनः स्थापित हो सकेगा।

