Published On:Sunday, March 23, 2014
Posted by NJFI media
महा हिसंक साम्प्रदायिकता के संकेत अभी से आना शुरू
उज्जैन। देश का अस्तित्व संकट में है एक और विभाजन का डरवना कुस्वप्न बार बार आता है। देश में झूठी, सिद्धांतवादी ताकते जो देश समाज, एकता, सामाजिकता, सद्भावना व सुख शांति की दुश्मन है वे ही ताकते अब सत्ता और राजनीति की केन्द्र बन गई है और ऐतिहासिक बर्बरताओं के आधार पर फिर देश की साम्प्रदायिक आग में जलाने के षडयत्र रच रहे हैं लोकसभा चुनाव के षडयत्र रचे जा रहे हैं उ.प्र. को गुजरात बनाने की बाते भी कही जा रही है जिन्हे हिन्दुत्व का संज्ञान नहीं और विशेष व स्ंय को सर्वश्रेष्ठ मानने वाली के विचारनुरूप भारत को हिन्दु देश घोषित करने की बाते भी कर रहे है। ऐतिहासिक बर्बरताओं को आधार बना कर साम्प्रदायिकता की आग में देश को जलाने का षडयंत्र है। जदयू नेता शरद यादव ने भी अपनी चिंता से देश को संचेत किया है।
ये साम्प्रदायिकत व देश को खण्डित करने वाली ताकते देश् की राजनीति व सत्ता को लोभवाद के माध्यम से स्वंय में केन्द्रित कर चुकी है अब देश व राजनैतिक निर्णय वे स्वंय करे देश में 80 प्रतिशत जनता पंथ निरपक्षता में विश्वास करती है किन्तु संगठित न होकर अनेक भागों में विभक्त है। महास्वार्थी, मक्कार, धूर्त, धनखोर पॅंूजीपति, उद्योगपति कालेधन कुबेर, कारपोरेट जगत ने भी अपनी कार गुजारी शुरू कर दी हैं सभी को धन वल द्वारा खरीद और वे ही जनता को लोभवाद के इन्जेक्शन लगा रहे हैं। शातिर भावनात्मक ठगी कर रहे हैं 2014 से 2019 के बीच, ध्र्म के नाम पर अतिकू्रर व हिसंक साम्प्रदायिकता भडकाने के षडयंत्र रचे जा रहे है। काशी, मथुरा, मुद्ा फिर गर्म करने की योजना है। चुनव 2014 में आद्यदेव शिव के नाम का उपयोग खुलकर हो रहा है। प्रचार किया जा रहे है। देश का खुफिया तंत्र भी महानिंद्रा में है। अब प्रजातांत्रिक स्थिति का लाभ उठाने की युक्ति नाजीवादी ताकते कर रही है। देश् के सभी पंथ, झूठे, सिद्धांतों की कू्ररता की हिरासत में है और सच्चे आध्यात्म से विमुख ै। इसी का लाभ, सत्ता व धनखोर चेहरे उठा रहे है। पंथवादी घिनौनी व संकीर्ण मानसिकता, गांव की पगडियों, चैपाल से लकर, संसद विधानसभाओं व दलों के कार्यालयों व नेताओं में विद्यमान है। साम्प्रदाियकता को बहुआयामी आकर्षक ढंग से प्रतिदिन आदमी में बोयी जा रही है। बच्चे युवा, जवान, बूढ साधू संत व आध्यात्मक विभूति भी शिकार नजर आ रहे है। अब तो चुनावों में भी जाति, वर्ग एवं पंथ वादिता स्पष्ट नजर आ रही ै। आराधना स्थलों के ही आपस में लडाकर सत्तावादी राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध नजर आ रहा। अब तो विचार, भावनाएं, मानसिकत ही साम्प्रदायिकता होती जा रही ैं।
उपरोक्त स्थिति कल्पना नहीं, अपितु हमारे देश, समाज व्यवस्था पंथ, दलों, राजनताओं, आध्यात्म विभूति का शाश्वत सत्य है। अपने अपने स्वार्थ सिद्धि एवं सत्तावादी राजनीति के खातिर सभी तो अपना सत्य ईमान, चरित्र आदर्श मर्यादाएं भावनाएं मानवीय मूल्य, अपना मष्तिष्क आत्मा व भगवान तक बेच रहे है। अपनी इस विवेकहीनत को महासफलता मान रे ै।


