दल बदलुओं का दौर जारी
उज्जैन। चुन आते ही दल बदल क दार शुरू हो जाता है, नेताओं की आस्था विश्वास, नीति, नियत, बदल जाती है। कल जिसे गालिया देते थे, उसे पूजने लगते है महज टिकिट व स्वार्थी के कारण, आये राम गये राम का मौसम जारी हैं दूसरा दल छोड कर विशेष् दल में जाने पर भव्य स्वागत हाता है अवसर दिए जाते है दल बदल एक ही बात कहते है उपेक्षा हो रही भी हमारा दल घुट रहा था इस कारण दल छोडा तो ऐसे है जो कांगे्रसी थे सपाई और दो दिन भाजपाई हो गये। भाजपा ने तो कांगे्रसी नेताओं के भाजपाईकरण का अभियान चलाया। शिवरज ने तो कांगे्रसी नेताओं को लोभवाद के माध्यम से खरीदा। सभी दल व नेता अब विश्वसनीय नहीं रहे है। सत्ता, धन, सुविधाओं पद ही उनका लक्ष्य जीवन विधा और कला। दलों व नेताओं का मान सम्मान चरित्र, नीति, नियत व जीवन शैली ही विकृत एवं अपराधी नेता व बदल प्रजातंत्र नहीं विकृत तंत्र के प्रतीक हो गए हैं। लोगो


