Published On:Sunday, December 1, 2013
Posted by NJFI media
मतदाताओं को खरीदने का चरित्र
उज्जैन। म.प्र. .चुनाव 2013 में चुनाव आयोग ने धनबल व बाहुबल पर नियंत्रण करने के अथक प्रयास किए। बाहुबल पर तो नियंत्रण लगा किन्तु धनबल पर आंशिक नियंत्रण ही लग पाया 16 करोड 30 लाख जप्त हुए, उन पर कोई दावेदारी नहीं जता रहा है। यह तो आंशिक राशि है। धन कुबेरे ने अपनी धन लीला के नगंग नाच प्रस्तुत किए हैं समाज के मतदाता ठेकेदारां के माध्यम से धन का खेल खेला। मतदाताओं की शातिर ढंग से खरीद फरोख्त हुईं 300 रूप से लेकर 500 रूप तक में मतदाता खरीदे गए। फुटकर एवं थोक में मतदाताओं की खरीद फरोक्ष्त हुई। यह कोइ्र परिकल्पना नहीं अपितु शाश्वत सत्य है। खुफिया तंत्र से इसकी खुफिया जाॅंच तुरंत कराई जाए तो उसका निर्वाचन रद्द किया जाये, दूसरे कम वाले प्रत्याशी को विजयी घोषित किया जाए तथा मतदाताओं को खरीदने वाले प्रत्याशी को 12 वर्ष तक के लिए आयोग्य घोषित किया जाए। प्रत्येक जिले में खुफिया जांच जरूरी हैं।
उपरोक्त तथ्य कोई परिकल्पना नहीं अपितु घटित सत्य हैं जो देखा है वही प्रस्तुत किया जा रहा है। देखना है कि चुनाव आयोग उपरोक्त सत्य पूरित संवाद को आधार बना कर कब जाॅंच कराता है और कितने धनकुबेर प्रत्याशियों पर कार्यवाही करता है। हमने जो देखा है वह चर्चाए आम है उसे ही प्रस्तुत कर रहे है। हमारे अपने देश में व्यवस्थाए ही बदचलन व चरित्रहीन हो गई है तो कोई क्या करें।
चुनाव प्रक्रिया में धन बल एवं बाहुबल समाप्ति हेेतु प्रत्याशी प्रचार का दायित्व भी सरकार ही निर्वाहन करें। झण्डे बैनर, होर्डिग्स व शोर भरे प्रचार पर भी प्रतिबंध अनिवार्य है। चुनाव प्रक्रिया में क्रान्तिकारी परिवर्तन की अनिवार्यता हैं।


