Published On:Sunday, December 1, 2013
Posted by NJFI media
साम्राराज्यवादी चीन, एशिया शांति व बर्बादी का केन्द्र रहा
उज्जैन। यदि एशिया में शान्ति रही तो समूचे विश्व में शांति रहेगी। यह सर्वमान्य धारणा हैं चीन यू तो साम्यवादी स्वरूप में है, अपने आपको लाल कहता है किन्तु यथार्थ में वह सामा्रराज्यवादी स्वरूप में है। राजनैतिक भूगोल की मान्यता थी कि इफ इन्डिया इज रेड एशिया बी रेड। भारत लाल नहीं हो सका और इसी कारण एशिया लाल नहीं हो सका। उपरोक्त मान्यता ध्वस्त हुई तो चीन ने सामा्रराजयवादी चरित्र अपनाया। भारत पर हमला किया व बडा भू भाग हथियाया रूस की जमीन पर भी अधिकार किया, तिब्बत हडपा, वियतनाम हडपने के प्रयास किए। द. कोरिया ने विरोध किया। अथाई चीन पर जापान से विरोध जारी है चीन विवादित दीपो से लेकर जापान से विवाद जारी है। चीन ने अपना नया हवाई क्षेत्र भी बनाया, इसी तरह नई समुद्री सीमा भी नई बनाई और जहाजी जंगी बेडा तैनात किया। भारत जमीन पर चीन की नजरे हं। अरूणाचल के बडे भूभांग को चीन तिब्बत का भाग बता कर भारत का अवैध कब्जा बता रहा है। अरूणाचल के सीएम ने चीन को लताडा। भारत सरकार को गंभीर कदम उठना चाहिए। जापान द. मोरिया से रुक्षा संधि को मूर्त रूप देना चाहिए तथा चीन के उत्पादकों की ब्रिकी पर भारत में प्रतिबंध लगाना चाहिए। अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु चीन ने पाक को माध्यम बनाया है और आजाद कश्मीर में अपनी स्थिति मजबूत की। कुछ ही समय बाद चीन आजाद कश्मीर को भी हडप लेगा। यह बात परिकल्पना नही भविष्य की शाश्वत सत्य है। चीन का मुकाबला भारत ही कर सकता है। अतः चीन के खिलाफ एशिया रक्षक सैन्य संगठन बनाना अनिवार्य है। भारत, रूस, पाक, अफगान, मध्यपूर्व दंुगनी वृद्धि अनिवार्य है।
चीन उत्पादो का उपयोग व व्यापार पर भी प्रतिबंध्श अनिवार्य। चीन की जासूसी प्रक्रिया को भी नाबूत करना है जो कम्प्यूटर व मोबाईल व अन्य कलपुर्जो के माध्यम से हो रही। एशिया मासोद व सीआए की संयुक्त कार्यवाही भी जरूरी हैं।
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