Published On:Saturday, January 25, 2014
Posted by NJFI media
राजनैतिक दलों का नकारात्मक चरित्र
उज्जैन। किसी भी देश के राजनैतिक दल उस दश की गरिमा बढाते है उसे शक्तिशाली बनाते है। अधिकांश देशों में दो या तीन दल ही सक्रिय रहते है। सत्ता हस्तांतरण का जन अभिसमय भी नजर आता है। भारत दलों व गठबंधनों का दल है। देश में 284 दल पंजीकृत है। गठबंधनों व मोर्चे का पंजीयन नहीं होता है। यदि हो तो लगभग 25 से 30 मोर्चे पंजीकृत हो जाए। अब तो हर कद्ृावर नेता अपना राजनैतिक दल बना लेता हैं क्यों की दलों के पंजीयन की प्रक्रिया सरल व लचीली हैं। सभी राजनैतिक दलों का आर्थिक स्वास्थ्य विदेशी व स्वदेशी चंदे पर निर्भर रहता है। देश की सभी राजनैतिक दल राजनैतिक चंदा लेने के अपराधी हैं।सी.आय.ए तक राजनतिक दलों को चंदा देती हैं। अपने लक्ष्यों की पूर्ति हेतु। भारत के दलों को भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से चंदा मिलता है। राजनैतिक अस्थिरता हेतु। भारत में दो वर्ग है सम्पन्न व वंचित। 20 प्रतिशत सम्पन्नों का अधिपत्य राजनैतिक दलों पर हता है। 80 प्रतिशत वंचित वर्ग को तो सभी दल कठपुतली की तरह नचाते हैं। देश के स्वदेशी आतंकी, पॅंूजीपति, उद्योगपति कालेधन कुबेर, माफिया समूह व कारपोरेट जगत दलों को करोडों का चुनावी चंदा देते है अपने हित व सार्वभौम एकाधिकार हेतु। अब तो इन चेहरों ने निर्वाहक न्यास बना कर चंदा देने की नीति अपनाली हैं।
सभी दल भरपुर चंदा लेते हैं, आयकर नहीं देते औरन ही चंदे का हिसाब सार्वजनिक करते है। चंदे के अलावा महाभ्रष्टाचार घोटालो में भी उनकी अहं भागीदारी रहती है। सभी दक्षिण पंथी व वामपंथी चंदे के रोगी है।
वर्तमान में कांगे्रस, भाजपा दक्षिणपंथी दल हैं, उन्हें करोडों में चंदा मिलता है बसपा सपा, राकपा यहा तक माकपा को भी चंदा देकर अपनी हिरासत में रखने की प्रवृत्ति है।
गोवा में भाजपा व कांगे्रस द्वारा वेदांता से 5.5 करोड चंदा लेने पर न्यायालय ने प्रकरण दर्ज करने के आदेश दिए। मोदी अंबानी व कारपोरेट जगत हजारों करोड व्यय कर रहे महज सत्ता सुन्दरी के अपहरण तथा अर्थव्यवस्था पर एकाधिकार हैं।
देश के सभी दल चंदेबाज है जो भी दल चंदा वसूलता है उसका राजनैतिक पंजीयन रद्द होने का प्रावधान होना चाहिए। प्राप्त चंदे पर आयकर की अनिवार्यता होना चाहिए। सभी राजनैतिक दलों का आडिट केग द्वारा होना चाहिए। जो भी चंदा देता है उसे चंदा राशि लेने व देने की प्रक्रिया को अपराधिक गति विधि ही माना जाना चाहिए। उपरोक्त व्यवस्था से ही राजनैतिक शुचिता स्थापित होगी। केन्द्र व प्रदेशों में लोकप्रिय सरकारों के गठन की संवैधानिक व्यवस्था भी अनिवार्य है। देश के सभी दल नकारा स्वरूप व परिवेश में ये दलवाद, देश, संविधान व्यवस्था व नागरिकों का भक्षक है। दलवाद का अंत जरूरी हैं।


