Published On:Thursday, January 9, 2014
Posted by NJFI media
शैक्षणिक त्रासदी का शिकार देश किसी को चिंता नहीं है क्यों?
उज्जैन। हिन्दुस्तान विश्व गुरू के रूप में ही विश्व में जाना जाता रहा हैं नालंदा, तक्षशिला, शांति निकेतन जैसे शिक्षणसंस्थानों ने अपनी विवेकवादिता, पूर्ण रूपेण वैज्ञानिक तथा ज्ञानविज्ञान सामजस्यी रूप में विश्व को शिक्षा का संज्ञान कराया है। वैश्विक शिक्षास्तर भारत का था। गुरूकुल शिक्षा पद्धति आज भी प्रासंगिक है, किन्तु उसे देश, समाज, परिवार और शिक्षार्थी भूला बैठे हैं। सभी को शांति निकतन जैसे ेप्राकृतिक संस्थान मं शिक्षाध्यन रास नहीं आ रहा। सीमेन्ट क्रांकिट के जंगलों से उन्हे लगाव है। पूर्व में शिक्षा ज्ञान दैविक आराधना व तपस्या जीवन के अमूल्य कर्तव्य माना जाता था। गुरू शिष्य परम्परा बेमिसाल थी। गुरू अपने शिष्य को पूर्ण मानव बना कर अपने गुरूकूल से विदा करता था। गुरू वशिष्ठ, द्रोणाचार्य, शुक्राचार्य, बुद्ध, टैगोर, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद उपरोक्त विचार के साक्ष्य हैं।
वर्तमान के बुद्धि चातुर्य, भौतिकतावादी परिवेश में, शिक्षा का स्वरूप ही बदल गया है अब शिक्षा व्यवसाय बन गई है, शिक्षा के नाम पर लूट, शातिर डकैती व ठगी हो रही है तो वह भी बड़े बडेे विज्ञापन देकर। क्या शिक्षा की निजी व्यापारी व प्रतिष्ठान सच्ची व सुसंस्कारित शिक्षा दे रहे है। या पैकेजवाद व नौकरशाह की मानसिकता का बोझ ढोने वाले शिक्षित पशु। इसका निर्णय शिक्षण संस्थान शिक्षार्थी व उनके परिवार ही करे।
देश का शैक्षणिक स्तर समाप्त हो चुका है। प्राथमिक मौलिक शिक्षा से लेकर विश्व विद्यालय नहीं है। इस बिन्दु पर सरकार शिक्षा संस्थानों व शिक्षाविदों ने कभी विचार ही नहीं किया कुछ दिन पूर्व महामहिम ने अवश्य ही चिंता जताई है सभी विश्व विद्यालयों के कुलाधिपति, कुलपति, शिक्षा संस्थानों के संचालक तथा शिक्षाविद् शैक्षणिक कू्रर त्रासदी पर गहन चिंतन मनन करे और विश्व के सर्वश्रेष्ठ व श्रेष्ठ विश्व विद्यालयों में भारत के विश्व विद्यालयों को देश के पॅंूजीपतियो ने भी, शिक्षा कठोर शिंकजा कसा। सोनिया मनमोहन, केजरीवाल, अडवाणी, शिक्षाविद, शैक्षणिक कू्रर त्रासदी को हमेशा के लिए समाप्त करने की पहल करें।


