Published On:Thursday, January 9, 2014
Posted by NJFI media
हम स्वंय में विवेकवादी बने
उज्जैन। वर्तमान का वातास, परिवेश हमारी भावनाए, कार्यपद्धति विचार, चाल चरित्र चेहरा संस्कार, आध्यात्मक अति कू्रर,हिसंक व उन्मादित स्वरूप में है। दिल और दिमाग का हम पर पूर्ण नियंत्रण और विवेकी परिवेश से बाहर है। हम सब दोहरा दोगला कोहरामवादी एवं स्वतः सुखायवादी चरित्र रखते है। यथार्थ में हम महानिद्रा में अपनी जीवन यात्रा पूर्ण कर रहे है। हमारा विश्वास झूठ व कुटिल सिद्धांतों में है, हम दूसरों को ता दूर स्वंय को जानने का चरित्र भी नहीं रखते है। भ्रम पर सत्य पर भ्रम के मकान व दूकान बनाने का चरित्र रखत है। हम विश्वास स्वंय को दूकान और मकान बनाने में है न की स्वंय को सच्चा मानवीय मूल्यों का घर बनाने व उसे बसाने में है। हम अटूट महानिंद्रा में है हमारे विवेकदीप धुॅंआ पहन चुके है, तिमिर को ही अपनी विरासत बना रहे है। हम आत्मिक रूप से भ्रमित है, विवेक हीनता को अपना लक्ष्य बनाये हुए है। विवेकी चेतना और सिद्धांतवादिता कर्मवादिता, बहुआयामी कू्ररता जीवन में दोहरा व दोगलापन कुसंस्कार, धन और कुचरित्र हमारे जीवन के प्रमुख लक्ष्य बन गए है। हम अपना कू्रर व घिनौना चेहरा लगा कर छुपाते है। धर्म, राजनीति धन अंह पाखण्ड के कागजी कपडे पहनकर अपना शरीर निखारते है, कफन के वस्त्र पहन कर स्वंय को महा मानव के रूप में प्रस्तुत करते है, सत्य की वर्षा तो दूर उसकी नमी मात्र से नगन्ता में आ जाते हैं। हम स्वंय में विकृति एवं अपने भाग्य व ईश्वर को दाषी जताते है। हमें स्वर्णिम प्रारब्ध बनाने से घृता करते है और परिकल्पनीय झूठी व भ्रमित स्थिति में अपनी जीवनयात्रा से घृणा करते है। हमारा विश्वास शव साधना में है। हम स्वंय के शव पर बैठकर अपना सत्य, ईमान, चरित्र सुसंस्कार व प्रारब्ध खाते है और गर्वित होते है। विवेकहीनता के आकाश, पाताल और धरती पर हम आदमी नहीं अपितु आत्मा खाने वाले जन्तु हैं। प्रकाश पुष्पों को खाना हमारी नीति नियत, चरित्र संस्कार व कर्म हो गए हैं। उपरोक्त हमारी स्थिति कोई परिकल्पनीय नहीं बल्कि हमारा शाश्वत सत्य हैं।
महान वैश्विक युगीन एवं युगोतरीय विचारों, सिद्धांतों व निर्णयों की महागीता हमारा अपना सत्य, हमारे सामने प्रस्तुत कल्प देव स्वामी विवेकानंद ने हमें सच्चा विवेकी आदमी बनने की प्रेरणा दी, हमारे मन, मष्तिष्क आत्मा को झकझोरा है। नव ज्ञान सूर्य उचित कर हमारे घिनौने तिमिर मयी जीवन यात्रा को विवेकी और ज्यातिमयी परिवेश में लोकर हमें सन्मार्ग दिखाया, किन्तु हम महामक्कारी व घिनौनेपन के पुतले, मकान, दूकान बनने पर ही अमादा है, विवेक ज्योति को भी अपने उदर में समाने का चरित्र रखते है बहुआयामी महानिद्रा को स्वर्गिक आनंद मानते हैं। स्वामी विवेकानंद ने महा मानव होने के महामंत्र भी दिए किन्तु हम दैत्यों ज्योर्ति देव व नरभक्षियों को उनके मंत्र पंसद व स्वीकार नहीं है।
‘‘उठो जागो, महानिंद्रा त्यागो, और अपने अपने लक्ष्य प्राप्त करो, स्वंय विवेकदीप बनो व विश्व को ज्योर्तिमयी करने हेतु विवेकदीप प्रज्वलन का चरित्र बनाओ, प्रतिपल आत्म चिंतन रहो और अपने सत्य से साक्षात्मकार करते रहा,े आत्म चिंतन महायोग व महा तपस्या है। आडम्बर पाखण्ड त्यागे कट्टर धार्मिक नहीं कट्टर आध्यात्मिक बनो। सर्व सम्मान भाव रखो आदेशक बनने की बजाय, सर्वश्रेष्ठ आदेश पालक बनो सभीआराधना स्थलों का सम्मान करो क्योकि सभी ईश्वर के विश्राम गृह है। झूठी, सिद्धातवादिता, पाखण्ड व अंह त्यागो। सभी के अस्तित्व व भावनाओं व आराधना स्थलों को नमन व सम्मान करो, ऐसा करने से आत्म सन्तुष्टी प्राप्त होती है नव आत्मिक परिवेश बनता है कभी किसी का उपहास मत करो, स्वंय के प्रारब्ध को उपरोक्त विचारो सिद्धांतो व कार्यो से स्वर्णिम बनाओ। उपरोक्त परिवेशी जीवनयात्रा ईश्वर की सच्ची सिद्धाभक्ति, महायोग, महातपस्या और आराधना है। संकल्प ले की हम सब स्वंय में विवेकदीप बनेगे।


