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Published On:Monday, January 27, 2014
Posted by NJFI media

दुनिया की सबसे लंबी महिला का एम्स में ऑपरेशन



नई दिल्ली
अपनी बढ़ती लंबाई और सिर, हाथ, पैर, नाक वगैरह के बढ़ते साइज की वजह से शबीना (बदला हुआ नाम) दस साल से घर में कैद थी। दुनिया के तानों और बच्चों की हंसी की पात्र बन चुकी शबीना यूं तो अपने 7 फीट 8 इंच लंबे कद की वजह से अपना नाम गिनेस बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड में दर्ज करा चुकी हैं। लेकिन, 15 साल की उम्र से जायगेनटिज्म विद ब्रेन ट्यूमर की बीमारी की शिकार शबीना को शुरू में इलाज नहीं मिला। लगातार उसकी बॉडी और बॉडी पार्ट्स का साइज बढ़ता गया।
दो बेड जोड़कर एम्स ने बनाया एक बेड: फिलहाल एम्स में भर्ती शबीना का ट्यूमर निकालने में डॉक्टरों को कामयाबी मिल चुकी है। उसकी सर्जरी करने वाले डॉक्टरों की टीम के लिए शबीना का केस इतना बड़ा चैलेंज था कि न केवल सर्जरी के लिए स्पेशल तैयारी करनी पड़ी, बल्कि ऑपरेशन थिअटर में उसके लिए दो बेड को जोड़कर स्पेशल बेड बनाया गया। थाई साइज के बीपी मशीन से उसकी जांच की गई। यही नहीं, सर्जरी के दौरान इंडोस्कोपी मशीन में 18 सेमी की जगह 30 सेमी की पाइप लगाई गई। डॉक्टरों का कहना है कि बेहिसाब लंबाई बढ़ना एक बीमारी है। शुरू में ही लोगों को इस पर ध्यान रखना चाहिए।

15 साल की उम्र से डिवेलप होने लगा ट्यूमरः इंडोक्रोनॉलजी डिपार्टमेंट के डॉक्टर निखिल ने बताया कि एक एनजीओ की मदद से शबीना को एम्स लाया गया। 7 फीट 8 इंच लंबी और 130 किलोग्राम की यह मरीज अंदर से काफी कमजोर थी। सालों से बेड पर पड़े होने की वजह से उसकी हड्डियां काफी कमजोर हो चुकी थीं। जब उसकी उम्र 15 साल थी, तभी से उसके ब्रेन में ट्यूमर डिवेलप होने लगा था, इस ट्यूमर को पिट्यूटरी एडेनोमा ग्रोथ हॉर्मोन भी कहते हैं। ट्यूमर बढ़ने से यह हॉर्मोन एक्टिव हो जाता है और बॉडी के पार्ट्स और पूरी बॉडी साइज बढ़ने लगती है। हॉर्मोन सामान्यत: 5 माइक्रो इंटरनैशनल यूनिट प्रति डेसी लीटर (mIu/dl) होता है।
लेकिन इस पेशंट में यह 80 था, जो सर्जरी के बाद अब केवल 15 रह गया है। अब आगे अगर हॉर्मोन का कुछ हिस्सा बच जाता है, तो इसे गामा नाइफ की मदद से खत्म किया जाएगा। चूंकि पीड़िता वर्षों से इस बीमारी की शिकार है, इससे उसकी बॉडी साइज के साथ-साथ इंटरनल अंग जैसे- हार्ट और बाकी पार्ट्स के साइज भी नॉर्मल से ज्यादा पाए गए। उन्होंने बताया कि ट्यूमर धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था और अब इसका असर उसकी आंखों की रोशनी पर भी पड़ सकता था। आमतौर पर ऐसे केस कम आते हैं, लेकिन इस मामले में ट्यूमर का साइज चार सेमी तक हो गया था, जो कभी भी हैमरेज हो सकता था।
आसान नहीं थी इस खास पेशंट की सर्जरी: न्यूरो सर्जन डॉक्टर आशीष सूरी ने बताया कि पीड़िता की सर्जरी 16 जनवरी को की गई। इंडोस्कोपी स्कल बेस्ड सर्जरी की गई। सबसे पहले नॉर्मल इंडोस्कोपी की जगह सबसे बड़े 30 सेमी की पाइप लगाई गई और इसे हाईटेक कंप्यूटर बेस्ड न्यूरो नेविगेशन सिस्टम से जोड़ दिया गया, जिसे स्क्रिन पर भी देखा जा सकता था। सबसे पहले नाक की एक छेद से एक इंडोस्कोपी की एंट्री कराई गई और जहां पर यह खत्म हुआ, वहां 10 एमएल का होल बनाया गया। फिर नाक की दूसरी छेद से दूसरी इंडोस्कोपी को अंदर डाला गया और उसके आखिरी छोर पर एक होल बनाया गया और फिर दोनों होल को मिलाकर एक बड़ा होल बनाया गया।
डॉक्टर ने बताया कि ब्रेन स्कल के सेंट्रल में सेला का स्ट्रक्चर होता है और ब्रेन को बचाने के लिए डूरा को ड्रील से काटकर ट्यूमर निकाला गया। उन्होंने कहा कि अगर ट्यूमर नहीं निकाला जाता, तो इसकी वजह से आंखों की नस पर दबाव बढ़ता और आंखों की रोशनी जाने की आशंका थी। मरीज अब पहले से बेहतर है। कुछ दिनों में उसे आईसीयू से बाहर शिफ्ट किया जाएगा।

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