Published On:Thursday, February 27, 2014
Posted by NJFI media
आद्यदेव शिव का सच्चा उपासक कौन?
आद्य़देव शिव की महिमा ही निराली है। आद्यदेव शिव में महाशक्ति भी समाहित है। शिव का अर्धनारीश्वर उसी बात का प्रतीक है। आद्यदेव शिव सृष्टि के सृजक, सरंक्षक व सहखदेव भी है। शिव पर कल्प और युग में प्रासंगिक रहे। आद्यदेव शिव का आराध्य कृष्णत्व है। शिव को भगवान विष्णु, राम, कृष्ण में पाया जाता है। आद्य देव बहुत भोले भण्डारी, महायोगी, महात्यागी महाशक्तिवान स्वरूपा है। शिव के अनेक नाम भी है शिव को गरल पान प्रिय है और विष पचाने व उसको कंठ में रोकने का सामथ्र्य भी है। शिव को नीलकण्ठेश्वर के रूप में जाना जाता है। शिव चन्द्र भुजंग व त्रिशूलधारी भी हैं शिव अपने आप में चमत्कारित भी है। शिव महादानी, ज्ञानवान व दूर दृष्टि के नायक भी है। शिव अवतरण व अवसान से भी उपर है, इसी कारण उन्हें महामृत्युजयी के नाम से भी जाना जाता है। शिव महादयालु व भक्तिप्रिय है। वे दृष्टि भक्तों को भी वरदान देने में नहीं हिचकते। आद्यदेव अपने आप में महा युक्ति भी है, किन्तु आज तक उन्हें युक्तिश्वर के नाम से किसी ने भी नहीं पुकारा। आद्य देव शिव महासन्तोषी भी है जो भी मिले, उसी में सन्तुष्ट रहते है इसी लिए शिव को आशुतोष के नाम से भी जाना जाता हैं।
आद्यदेव शिव नियति चक्र के महा सम्मानक भी है स्वार्थभाव उनमें तनिक भी नहीं। अपने परिवार तक को परिणाम प्राप्ति, नियुक्ति चक्र के विरूद्ध उपहारित नहीं किया। आद्यदेव शिव वचन के पक्के है। वे अपने भक्त की पूरी तरह रक्षा भी करते है व देवताओं से युद्ध भी है।
जरासंक के द्वार पर कृष्णत्व स्वरूपा से भी युद्ध करने में नहीं हिचके। जब उन्हें कृष्णत्व स्वरूप का संज्ञान हुआ तो मूर्छित हो गए। आततायी, अहंकारी, छली, कपर्टी व बुराई के प्रतीक रावण का अंत करने हेतु प्रक्रिया शुरू की तो शिव की आराधना की जो राम की शक्ति पूजा के रूप में आज भी चर्चित हैं। भगवान विष्णु के महारौद्र स्वरूप को शिव ने ही शांत किया। महाकाली की महा विनाश लीला को शिव ने जमीन पर लेटकर रोका। भस्मासुर का युक्तियुक्त वध कराया, जैसे अनेक दैत्यों को भस्म किया व उनके पुर्नजीवन को समाप्त करने हेतु भस्मी तक को लेप शरीर पर किया। उन्हें भस्माआरती भी प्रिय है चन्द्र मौलेश्वर शिव अति शांत रहते है, गंगा के प्रवाह अं को अपनी जटाओं में उलझाया, बाद में धारा के रूप में मार्ग दिया। शिवध्यान प्रिय है, जो भी ध्यान भंग करता है, उसे तीसरा नेत्र खोलकर भस्मी भूत कर देते है, कामदेव मर्दन प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं। शिव महा तपस्वी है। शिव को पाप, अहं, स्वार्थ, शोषण, अन्याय, कुचरित्र, कुसंस्कारों, नियति से छेडछाड व अप्रियता पसंद नहीं है। वे तांडव नृत्य कर सहारंक की भूमिका निभाने में नहीं चूकते। भूकम्प, तूफान, जलप्रलय, अकाल मृत्यु, आद्यदेव के तांडव का ही रूप है।
आद्यदेव शिव को इसी कारण महादेव कहा जाता है। शि उपासना, अति सहज व सरल व कठीन भी है। सच्ची शिव आराधना जानना भी जरूरी है। सच्चे अर्थो में उपवास व उपकाक्षी होकर, स्वंय का आत्मचिंतन करना, अपने अपने सत्य से साक्षात्कार कर, अपने असली रूप व स्वरूप को जानना, अपने सभी अपराधों को स्वीकारते हुए, प्रायश्चित करना तथा अपनी समस्त बुराईयों को ज्ञान व विवेक यज्ञ में आहुती देकर, सच्चा नेक कट्टर आध्यात्मिक सुसंस्कारी लोक उद्धारक, सच्चा सेवाभावी सत्यभार्गी नियति श्रृगांरक व सुकर्मी इन्सान व्यवहारिक रूप में बनना ही सच्ची आद्यदेव शिव आराधना है। उपरोक्त उपासना व आराधना भक्ति से शिव तुंरत प्रसन्न होते है और कृष्णत्व के चरणरज बनने का अभय वरदान भी देते हैं।
प्रत्येक शिवभक्त स्वंय का आत्मचिंतन करे व निर्णय ले की क्या यथार्थ में वह सच्चा शिवभक्त है या बुराईयों का दैत्य। जो अहं, पाखण्ड, स्वार्थ लोभ, कुसंस्कारों कुचरित्र दोहरेपन, अहंकार धन विकृति, भोग विलास, शोषण, अन्याय व कुनीति का पुतला हो। वह कभी आत्मचिंतन नहीं करता। अपना दैत्यी स्वरूप छुपाने अहं, पाखण्ड, दिखावे का धर्म तथा अनेक प्रकार की नाटक नौटंकी करता है और स्वंय को महाधार्मिक जताता है। मन, मष्तिष्क, विचार, कर्म भावनाए,ं आस्थाए व चरित्र सुसंस्कार ही प्रदूषित विकृत अहंकारी व स्वार्थी हो, वह शिवभक्त तो क्या दैत्य, उपासक होता है। आज का आदमी स्वंय को झूठ, अहंकार व स्वार्थी हो, वह शिवभक्त तो क्या दैत्य उपासक होता है। आज का आदमी स्वंय को झूठ, अहंकार, कुसंस्कार, स्वार्थ व पाखण्ड का पुतला बनाने में विश्वास रखता है वह भूल जाता है सत्यम शिवम सुन्दरम भाव को सत्य ही शिव है, वही सुन्दर है। आत्मचिंतन से सत्य से साक्षात्कार होता है, शिवत्व वृत में प्रदेश होता है जो सुन्दर होता है। आज का भक्त तो सच्चा उपवासी बन कर आत्मचिंतन करना, सत्य से साक्षात्कार कनना पापों का प्रायश्चित करना, विवेक यज्ञ करने का अपराध ही मानता है व महापाप मानता है आज भी संकल्प ले की रामत्व व शिवत्व प्राप्त कर, कृष्णत्व भक्त मण्डल का अणु बने। यही महाशिवरात्रि पर्व का लक्ष्य व सच्ची शिव उपासना है। -बैजू शर्मा आगर जिला


