Published On:Saturday, March 22, 2014
Posted by NJFI media
ज्ञात, अज्ञात शहीदों को सलाम
23 मार्च क्रांतिकारी भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू की शहादत का दिन है। कृतज्ञ देश सभी ज्ञात एवं अज्ञात शहीदों की शहादत को सलम करते हुए, श्रृद्धासुमन अर्पित करता है। श्रृद्धाजंलि की महज औरपचारिकता पूर्ण की जाती है कोई भी नहीं चाहता कि भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, अशफाक उल्ला, दुर्गा भामी, गणेश शंकर, विद्यार्थी चन्द्रशेखर आजाद व अन्य ज्ञात अज्ञात शहीदों जैसे विभूतियाॅं उनके घरें में जन्म ले। अब तक हर घर की चाहत की उनके घर में पैकेजप्राप्ति काली संतान ही पैदा हो। अब तो शहीद व शहादत भूलायी जा रही है , आदमी धन, सुरा, सुन्दरी, घिनौनी राजनीति, झूठी सिद्धांतादिता लोभ, स्वार्थ, स्वातः सुखाय शेोषण्, अन्याय झूठ फरेब मक्कारी विश्वासघात व धूर्तता में ही केन्द्रित हो गया है। आज का आदमी, आदमी नहीं मात्र गिडोला चरित्रवादी हो गया है सब कुछ खान रेगंना व मिट्टी में मिलना ही उसकी जीवन विधा और कटला हो गई है कि वह अपना, सम्मान, गौरख, सुसंस्कार, चरित्र, मर्यादा अपना सत्य, मन, मष्तिष्क, विचार निर्णय अपनी चिता व आत्मा तथा अपना अपना भगवान तक बेच रहा, अपनी विवेकहीनत के अपना सैभाग्य व भाग्यादेय मान रहा है। आदमी अंध विश्वास, अंधानुकरणी आत्म चिंतन व सत्य से विहीन व लोभ की आग में जलता पुतला नजर आ रहा है देश, समाज, सुव्यवस्था, सुसंस्कार सुचरित्र सेवा लोक उद्धार प्रकृति श्रृगार व निष्काम तो भूल चुका है किन्तु अपने अपने घिनौने स्वरूप पर आत्म चिंतन व विचार हेतु की कला व विधा भी भूल चुका है देश समाज,धूर्तता, स्वतः सुखाय व पैकेजवादी जीवन यापन में विश्वास कर रहा। समूचा देश धनखोरों सत्ता, स्वादुओ, अपराधियों, शोषकों व अन्यायी , अत्यावारियों व लूटेरों व घिनौने नेताओं व दलों से आच्छादित है।
देश का शाश्वत सत्य तो यह की शहीदां के खून से रेशन चिरागों को बुझाय जा रहा है, उनका खून तक पीया जा रहा है और हड्डिया तक चबाई जा रही है, ज्ञात अज्ञात शहीदों को भी भूखे भेडिये अपने उदर में समा रहे है शहीदों व विभूतियां के स्मरण का भी बाजरीकरण व राजनीतिकरण हो रहा है उन्हें भी देशद्रोही चेहरे, अपनी अपनी जागीर बन रहे है। विदेशों ताकतों के गुलाम व बंधुव मजदूर भी अपने अपने चेहरों पर देश, समाज, मानव, सुव्यवस्था के ठेकेदार होने की नटक नौटंकिया कर रहे है। शहीद और विभूतियों के शवों पर बैठकर, सभी अपनी राजनैतिक सामाजिक व व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि कर रहे हैं। महामक्कार धूर्त अत्यंत ी कुटिल व घिनौने बहुरूपिये दैत्य है जो तिरंगा को अपने हाथों का मलाल, सांसद व विधानसभाओं को सब्जी मण्डी व मच्छी बाजार, देश का ब्रांड सब कुछ अपने उद्धर में समाने का कमाल कर रहे है सभी को खा रहे है फिर भी उद्धारक व मसीहा स्वंय को जता रहे है। राजा और रंक की चाल, चरित्र व चेहरा एक सम्मान हो गया है। अब देश में ज्ञात, अज्ञात शहीद ही पैद है क्योंकि शहादत, त्याग, सेवा, देशप्रेम, सुव्यवस्था, सेवा, निष्काम, कर्म व प्रकृति श्रृगार के विचारों का दाह सस्कार हो चुका है सभी शव साधना में लीन है। ज्ञात अज्ञात शहीद की आत्मा हम सभी को धिक्कार रही है
देश का शाश्वत सत्य तो यह की शहीदां के खून से रेशन चिरागों को बुझाय जा रहा है, उनका खून तक पीया जा रहा है और हड्डिया तक चबाई जा रही है, ज्ञात अज्ञात शहीदों को भी भूखे भेडिये अपने उदर में समा रहे है शहीदों व विभूतियां के स्मरण का भी बाजरीकरण व राजनीतिकरण हो रहा है उन्हें भी देशद्रोही चेहरे, अपनी अपनी जागीर बन रहे है। विदेशों ताकतों के गुलाम व बंधुव मजदूर भी अपने अपने चेहरों पर देश, समाज, मानव, सुव्यवस्था के ठेकेदार होने की नटक नौटंकिया कर रहे है। शहीद और विभूतियों के शवों पर बैठकर, सभी अपनी राजनैतिक सामाजिक व व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि कर रहे हैं। महामक्कार धूर्त अत्यंत ी कुटिल व घिनौने बहुरूपिये दैत्य है जो तिरंगा को अपने हाथों का मलाल, सांसद व विधानसभाओं को सब्जी मण्डी व मच्छी बाजार, देश का ब्रांड सब कुछ अपने उद्धर में समाने का कमाल कर रहे है सभी को खा रहे है फिर भी उद्धारक व मसीहा स्वंय को जता रहे है। राजा और रंक की चाल, चरित्र व चेहरा एक सम्मान हो गया है। अब देश में ज्ञात, अज्ञात शहीद ही पैद है क्योंकि शहादत, त्याग, सेवा, देशप्रेम, सुव्यवस्था, सेवा, निष्काम, कर्म व प्रकृति श्रृगार के विचारों का दाह सस्कार हो चुका है सभी शव साधना में लीन है। ज्ञात अज्ञात शहीद की आत्मा हम सभी को धिक्कार रही है


