Published On:Monday, April 7, 2014
Posted by NJFI media
घर घर लंका दर दर रावण, इतने राम कहा से लाये
उज्जैन। कलियुग का युग और कलयुग में महापतन चक्र चल रहा है महापतन रक्षेत्र में दस्तक दे रहा है, आदमी, व्यवस्थाए, संस्कार, धर्म, आध्यात्म व जीवन ही बौना होता जा रहा है। प्राणी अपने आप में उन्मादित, स्वार्थ, पाखण्डी, महाभक्षक, दैत्य ो गया है। अब तो घर घर लंका हो गई ैं और दर दर रावण ही नजर आ रहा है बहुआयामी महापन की गोद में देश,समाज, व्यवस्था धर्म, आध्यात्म, संस्कार, सभ्यता, मर्यादा, आदर्श एवं मानवीय मूल्य बैठे है सभ्ीका विश्वास मर्यादा आद्यदेव शिव, मर्यादा पुरषोत्तमराम, पूर्ण पुरूषोत्तम श्रीकृष्ण, कृष्णत्व व अच्छे आध्यात्म में नीं। रावणों के गिरो, भीड व कुकृत्य, सांसद से सडक गाव की पगडी से घर की देलीज तक रावणवाद ही रावणवाद। वर्ष मेंएक दिन राम जन्मोत्सव मनाने की नाटक नौटंकी तथा कथित उक्त राम भक्तों द्वारा। रावणों की भीड, उन्माद पूर्वक अपने स्वार्थ बुआयामी स्वार्थ सिद्धि हेतु राम के जयकारे लगा रही, धन व चंदा खोरी कर रही। राम का खूब अवमूल्यन किया, राम अस्तित्व व मर्यादाओं की त्याग की और उसी के शव पर बैठ कर सिद्ध शव साधक होने की प्रतियोगिता समूचे देश में। राम तो जल समाधि लेकर अन्र्तध्यान हो गए, किन्तु उनके नाम का उपयोग कर रावणों की भीड अब राम कोभी चुनावी घोषणा पत्र का मुद्दा बना रही है। यह धु्रव सत्य है की दीमके कभी रामयण, गीता व बाईबल नीं पडती न ही उनका विश्वास शिव, रामकृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईशु, दयानंद, विवेकानंद और गांधी में होता ै व तो उसे खाने के लिए जन्म लेती है और खाते ही मर जाती ैं। सुरा, सुंदरी, धन, स्वार्थ, लोभ, पद, अहं पाखण्ड, कुसंस्कार, घिनौनापन, कुचरित्र, घिनौनी मानसिकता, विवेकहीनता सर्व अपमान, पूर्वाग्रह, छलकपट, मक्कारी, षडयंत्र, विश्वासघात, सच्चे आध्यात्म की हत्या पर सभी गर्वित व हर्षित है र आदमी की अपनी यही कहानी। म स्वंय में रावण है और राम जन्मोत्सव मनाने की खूब सूरत धोखाधडी करतेे हैं, सभी को छलते हैं। हर मर्यादा तोडते है और मर्यादा, पुरूषोत्तम राम के भक्त बनते है। राम क्या थ्ेो और रहेग किसी को संज्ञान नहीं। रावणी चरित्र के पूजक हम सब है। सभी तरफ रावणवाद, लंकावाद, और पाखण्डवाद, सचतो यह है कि हम सब कलियुगी रावण हो गए है, अब तो मर्यादा पुरूषोत्तम राम और भक्त हनुमान साक्षात आ जाए तो रावण वध और लंका दहन शायद ही कर पाये। विडम्बना यही की घर घर लंका व दर दर रावण पैदा हो गए हैं। रावणों को ही राम मान कर,उनकी पूजा, करो, उनका जन्मोत्सव मनाओं, उनके जन्मदिन पर होर्डिग्स, बैनर लगवाओ, समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवाओं और सुरा सुन्दरी की काकटेल पार्टी मनाओ, अब तो मर्यादा पुरूषोत्तम राम तीनों लोक में आने को तैयार नहीं। रावणों व राज बाराणसी संस्कृति में ही जीवन यात्रा पूर्ण करे।


