Published On:Friday, July 4, 2014
Posted by NJFI media
अव्यवस्थाओं के बीच बेहतर षिक्षा का स्वप्न छत्तीसगढ़ सरकार का शालाप्रवेष उत्सव
एनजेएफआई के लिए छत्तीसगढ़ से अलख मिश्र की रिपोर्ट:- एक बार फिर छत्तीसगढ़ सरकार बिना अपनी व्यवस्था में सुधार किये राष्ट्र का भविष्य गढ़ने की तैयारियां में जुट गई है।
ज्ञात हो कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी राज्य सरकार द्वारा लाखों-करोड़ों खर्च कर षाला प्रवेष उत्सव मनाने की तैयारी की जा रही है, जिसका परिणाम प्रति वर्ष की भांति षून्य ही प्राप्त होना है।
प्रत्येक बच्चे तक षिक्षा पहुंच सके इसके लिए सरकार द्वारा लोभ लुभाने तौर-तरीकों को अपना कर बेहतर षिक्षा प्रदान करने का दावा षाला प्रवेषत्सव का आयोजन कर लिया जाता है। जिससे क्षेत्र के मंत्री-विधायक, अफसर-कलेक्टरों के द्वारा सरकारी स्कूलों में बच्चों को गणवेष आदि बांट कर उनको षाला प्रवेष कराया जाता है।
एक ऐसी संस्थान में उनको प्रवेष दिया जाता है। जहां मुफ्त का खाना-कपड़ा, पुस्तकें, साईकले तो उपलब्ध होती है। मगर जिस बात के लिए वे षाला आते है उन्हें वो ही चीज नहीं मिलती। मिलेगी भी कैसे ? षिक्षा ही एक ऐसी चीज है जिसको बांटने के लिए किसी प्रकार की कमीषनखोरी नहीं की जा सकती, और जिस काम के बदले कमीषन ना मिले उस काम के प्रति हमारे देष के मंत्री-अफसर अपना कोई दायित्व नहीं समझते, षिक्षा के जुडी बाकी योजनाओं पर बेषक पूरा ध्यान दिया जाता है, जिसमें खरीदारी से लेकर निर्माण तक के कामों में अपना मुनाफा बनाया जा सके।
सरकार की ऐसी लाचार व्यवस्था का फायदा निजी षिक्षण संस्था वाले भरपूर उठाया करते है। निजी संस्थानों के द्वारा मनमानी फीस वसूल कर बेहतर षिक्षा देने का दावा किया जाता है, जिसके बदले अभिभावकों से छुट्टी के दिनों की भी पूरी फीस ली जाती है। उन्हीं निजी स्कूलों के द्वारा कोचिंग संस्था भी पूरे स्कूलों के तर्ज पर चलायी जाती है। जहां एक-एक कक्षा में 30-40 बच्चों को बैठा कर कोचिंग दिया जाता है। षिक्षा का व्यवसायी करण करते हुए निजी संस्थानों ने अपने पाठ्क्रम भी पेटेंट करा लिए हैं, जिनकी पुस्तकें उनके द्वारा चयनित की गई दुकानों पर ही उपलब्ध होती है।
सरकार के द्वारा दिखाया गया बेहतर षिक्षा का स्वप्न निजी संस्थानों के द्वारा पूरा करने का दावा किया जाता है। जिसका सीधा असर बच्चों एवं परिजनों पर पड़ता है। निजी संस्था में ना तो गणवेष में एक रूपता होती है, ना ही फीस में और ना ही पाठ्यक्रमों में जिसके फलस्वरूप बच्चों के अभिभावकों को मानसिक व आर्थिक परेषानियों से गुजरना पड़ता है। हमने षिक्षा का एक ऐसा भी दौर गुजरते हुए देखा है जिसमें बच्चे किसी भी सरकारी या निजी संस्था में पढ़ते हों वो अपने आगे की कक्षा में पढ़ने वाले छात्र से उनकी पुस्तकें लेकर अपनी पढ़ाई किया करते थे और अपनी किताबों को अपने से नीचे कक्षा वालों को देकर उनकी पढ़ने में मदद किया करते थे। लेकिन आज के शिक्षा के व्यवसायिकरण ने पढ़ाई का वह स्वरूप ही बदल कर रख दिया है। शिक्षा के उस दौर में जहां तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को पाठ्यक्रम में हरिवंष राय बच्चन की कविता तो मुंषी प्रेम चंद्र की कहानियां पढ़ाई जाती थी। मगर आज के पाठ्यक्रम में से ऐसे महान विभूतियों को पुराने दौर का बतला कर बच्चों से दूर कर दिया गया है, पहले की पुस्तकों में एक ओर राष्ट्रगीत छपा होता था तो दूसरी ओर राष्ट्रगान हुआ करता था मगर आज के इस कमीषनखोरी वाली षिक्षा व्यवस्था में राष्ट्र भक्ति भी गुम होती जा रही है।
सरकार अगर वाकई बच्चों को बेहतर षिक्षा देना चाहती है और अगर षिक्षा के क्षेत्र में बढ़ रही कमीषनखोरी को बंद करना चाहती है तो उसे सख्ती से इस व्यवस्था को लागू करना होगा जिसमे चपरासी से लेकर अफसर और सरपंच से लेकर मंत्री तक के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने का बाध्यकारी आदेष जारी करना होगा। तब शायद ही किसी सरकारी स्कूल में अव्यस्था देखने के मिलेगी । क्योंकि अगर किसी सरकारी स्कूलों में किसी जिले के कलेक्टर का बच्चा पढ़ता हो तो उसे स्कूल की सारी व्यव्स्था किसी निजी संस्थान से कम नहीं होगी।
साथ ही इस बात को भी लागू करना होगा कि अगर किसी भी सरकारी कर्मचारी का बच्चा किसी निजी संस्था में पढ़ता पाया जाये तो उस सरकारी कर्मचारी के वेतन में से बच्चे के पढ़ाई पर हो रहे खर्च को काटा लिया जाये।
अगर ऐसी व्यवस्था को लागू करने में सरकार सफल होती है तो निष्चय ही यह षिक्षा के क्षेत्र में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा, साथ ही निजी संस्थानों के लिए भी एक सबकनाक कार्यवाहि होगी इसके साथ ही सरकार को षिक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूलों में नियुक्त करने का प्रावधान लागू करना होगा, क्योंकि वर्तमान समय में षिक्षाकर्मियों को अपने निवास स्थान से सैकड़ों कि.मी.तक के दायरों मंे जाकर अपनी ड्यूटी करनी होती है जिसकी वजह से कई शिक्षाकर्मी स्कूलों तक ही नहीं पहुंचते वे हफ्ते में एक बार जाकर पूरे हफ्ते की ड्यूटी निभा कर चले आने का एक नियम सा बना चुके हैं। अगर इसे वक्त रहते नहीं सुधारा गया तो आज पगडंडी के समान दिखने वाले रास्ते को डब्लू.बी.एम से डामरी सड़क बनते देर नहीं लगेगी।
ज्ञात हो कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी राज्य सरकार द्वारा लाखों-करोड़ों खर्च कर षाला प्रवेष उत्सव मनाने की तैयारी की जा रही है, जिसका परिणाम प्रति वर्ष की भांति षून्य ही प्राप्त होना है।
प्रत्येक बच्चे तक षिक्षा पहुंच सके इसके लिए सरकार द्वारा लोभ लुभाने तौर-तरीकों को अपना कर बेहतर षिक्षा प्रदान करने का दावा षाला प्रवेषत्सव का आयोजन कर लिया जाता है। जिससे क्षेत्र के मंत्री-विधायक, अफसर-कलेक्टरों के द्वारा सरकारी स्कूलों में बच्चों को गणवेष आदि बांट कर उनको षाला प्रवेष कराया जाता है।
एक ऐसी संस्थान में उनको प्रवेष दिया जाता है। जहां मुफ्त का खाना-कपड़ा, पुस्तकें, साईकले तो उपलब्ध होती है। मगर जिस बात के लिए वे षाला आते है उन्हें वो ही चीज नहीं मिलती। मिलेगी भी कैसे ? षिक्षा ही एक ऐसी चीज है जिसको बांटने के लिए किसी प्रकार की कमीषनखोरी नहीं की जा सकती, और जिस काम के बदले कमीषन ना मिले उस काम के प्रति हमारे देष के मंत्री-अफसर अपना कोई दायित्व नहीं समझते, षिक्षा के जुडी बाकी योजनाओं पर बेषक पूरा ध्यान दिया जाता है, जिसमें खरीदारी से लेकर निर्माण तक के कामों में अपना मुनाफा बनाया जा सके।
सरकार की ऐसी लाचार व्यवस्था का फायदा निजी षिक्षण संस्था वाले भरपूर उठाया करते है। निजी संस्थानों के द्वारा मनमानी फीस वसूल कर बेहतर षिक्षा देने का दावा किया जाता है, जिसके बदले अभिभावकों से छुट्टी के दिनों की भी पूरी फीस ली जाती है। उन्हीं निजी स्कूलों के द्वारा कोचिंग संस्था भी पूरे स्कूलों के तर्ज पर चलायी जाती है। जहां एक-एक कक्षा में 30-40 बच्चों को बैठा कर कोचिंग दिया जाता है। षिक्षा का व्यवसायी करण करते हुए निजी संस्थानों ने अपने पाठ्क्रम भी पेटेंट करा लिए हैं, जिनकी पुस्तकें उनके द्वारा चयनित की गई दुकानों पर ही उपलब्ध होती है।
सरकार के द्वारा दिखाया गया बेहतर षिक्षा का स्वप्न निजी संस्थानों के द्वारा पूरा करने का दावा किया जाता है। जिसका सीधा असर बच्चों एवं परिजनों पर पड़ता है। निजी संस्था में ना तो गणवेष में एक रूपता होती है, ना ही फीस में और ना ही पाठ्यक्रमों में जिसके फलस्वरूप बच्चों के अभिभावकों को मानसिक व आर्थिक परेषानियों से गुजरना पड़ता है। हमने षिक्षा का एक ऐसा भी दौर गुजरते हुए देखा है जिसमें बच्चे किसी भी सरकारी या निजी संस्था में पढ़ते हों वो अपने आगे की कक्षा में पढ़ने वाले छात्र से उनकी पुस्तकें लेकर अपनी पढ़ाई किया करते थे और अपनी किताबों को अपने से नीचे कक्षा वालों को देकर उनकी पढ़ने में मदद किया करते थे। लेकिन आज के शिक्षा के व्यवसायिकरण ने पढ़ाई का वह स्वरूप ही बदल कर रख दिया है। शिक्षा के उस दौर में जहां तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को पाठ्यक्रम में हरिवंष राय बच्चन की कविता तो मुंषी प्रेम चंद्र की कहानियां पढ़ाई जाती थी। मगर आज के पाठ्यक्रम में से ऐसे महान विभूतियों को पुराने दौर का बतला कर बच्चों से दूर कर दिया गया है, पहले की पुस्तकों में एक ओर राष्ट्रगीत छपा होता था तो दूसरी ओर राष्ट्रगान हुआ करता था मगर आज के इस कमीषनखोरी वाली षिक्षा व्यवस्था में राष्ट्र भक्ति भी गुम होती जा रही है।
सरकार अगर वाकई बच्चों को बेहतर षिक्षा देना चाहती है और अगर षिक्षा के क्षेत्र में बढ़ रही कमीषनखोरी को बंद करना चाहती है तो उसे सख्ती से इस व्यवस्था को लागू करना होगा जिसमे चपरासी से लेकर अफसर और सरपंच से लेकर मंत्री तक के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने का बाध्यकारी आदेष जारी करना होगा। तब शायद ही किसी सरकारी स्कूल में अव्यस्था देखने के मिलेगी । क्योंकि अगर किसी सरकारी स्कूलों में किसी जिले के कलेक्टर का बच्चा पढ़ता हो तो उसे स्कूल की सारी व्यव्स्था किसी निजी संस्थान से कम नहीं होगी।
साथ ही इस बात को भी लागू करना होगा कि अगर किसी भी सरकारी कर्मचारी का बच्चा किसी निजी संस्था में पढ़ता पाया जाये तो उस सरकारी कर्मचारी के वेतन में से बच्चे के पढ़ाई पर हो रहे खर्च को काटा लिया जाये।
अगर ऐसी व्यवस्था को लागू करने में सरकार सफल होती है तो निष्चय ही यह षिक्षा के क्षेत्र में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा, साथ ही निजी संस्थानों के लिए भी एक सबकनाक कार्यवाहि होगी इसके साथ ही सरकार को षिक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूलों में नियुक्त करने का प्रावधान लागू करना होगा, क्योंकि वर्तमान समय में षिक्षाकर्मियों को अपने निवास स्थान से सैकड़ों कि.मी.तक के दायरों मंे जाकर अपनी ड्यूटी करनी होती है जिसकी वजह से कई शिक्षाकर्मी स्कूलों तक ही नहीं पहुंचते वे हफ्ते में एक बार जाकर पूरे हफ्ते की ड्यूटी निभा कर चले आने का एक नियम सा बना चुके हैं। अगर इसे वक्त रहते नहीं सुधारा गया तो आज पगडंडी के समान दिखने वाले रास्ते को डब्लू.बी.एम से डामरी सड़क बनते देर नहीं लगेगी।


