Published On:Thursday, October 10, 2013
Posted by NJFI media
पढ़ें: स्वयंसेवक से पीएम इन वेटिंग तक नरेंद्र का सफर
नई दिल्ली। मोदी अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने ये ऐलान कर दिया। बैठकों के बेशुमार दौर और आडवाणी की हां-ना के बाद हुए इस ऐलान से बीजेपी समर्थकों में जबरदस्त जोश है। तब से जब उन्हें पार्टी की प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। आइए देखते हैं एक आम स्वंयसेवक से इस मुकाम तक पहुंचे नरेंद्र मोदी का सफर।
गुजरात मोदीवाद की प्रयोगशाला है। यहां मोदी समर्थकों के लिए मोदीवाद के शॉपिंग मॉल हैं, जाति विहीन हिंदुत्व है, गुजराती पहचान है, शत्रु के नाम पर मुस्लिम हैं, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, कुशल प्रशासन है और खुला दिल्ली विरोध है। हर विधानसभा चुनाव में वोटरों के लिए ये दुकानें सजती हैं।
नरेंद्र मोदी अपनी पोशाक और पहचान का खास ध्यान रखते हैं। हमेशा डिजायनर खादी में स्मार्ट दिखने की कोशिश करते हैं। लोग मोदी को हिंदू ह्रदय सम्राट से लेकर गुजरात गौरव तक की उपाधि देते थे। लोग अब उन्हें भावी प्रधानमंत्री कहते हैं।
लेकिन मुसलमानों के साथ मोदी के रिश्ते दुखती नस ही रहे। 2002 दंगों की लपटें अब भी मोदी का पीछा करती हैं। गुजरात उदय में मुसलमानों के साथ सौतेला बर्ताव ही होता रहा। बहुत से लोग फले-फूले, बहुत से लोग दंगे भूल भी गए। इन सब के बीच ये समुदाय गुजरात की मुख्यधारा में वापस नहीं लौट पाया है।
जुहापुरा को गुजरात की गाजा पट्टी कहा जाता है। कभी घनी मुस्लिम आबादी वाला जुहापुरा गुजरात की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है लेकिन उसे रास्ता नजर नहीं आता। अपने एक दशक से ज्यादा पुराने कार्यकाल में मोदी एक बार भी इस इलाके में नहीं आए।
हकीकत ये भी है कि 2002 के बाद गुजरात में शांति है। कभी मोदी के खिलाफ याचिका दायर करने और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय अदालत में ले जाने की कोशिश करने वाले जफर सरेशवाला का बीएम डब्ल्यू कारों का शोरूम गुजरात के विकास की कहानी का प्रतीक है। ये बात अलग है कि एसजी रोड पर किसी मुसलमान का ये अकेला शोरूम है।
2011 में मोदी ने अपने बहुप्रचारित सद्भावना अभियान में मोदी ने मुसलमानों तक पहुंचने की कोशिश की। सूरत में सूफी समुदाय के आलिम महबूब अली जैसे लोग मोदी के मंच पर नजर आए। वहीं 2002 में 69 मुसलमानों की लाश देख चुकीं गुलबर्ग सोसायटी में मोदी को लेकर कोई दो राय नहीं है। रूपा मोदी का का बेटा अजहर तब 12 साल का था जब हमलावरों ने यहां कत्लेआम किया था। अजहर अभी तक लापता है। रूपा मोदी ने कहा कि नरेंद्र मोदी ने मेरे बच्चे के जिस्म पर फ्लाइओवर और पुल बनाए हैं।
वडोदरा में प्रोफेसर बंदूकवाला का घर दंगाइयों ने उजाड़ दिया। उनका कहना है मोदी माफी मांगे तभी कुछ सोचा जा सकता है। लेकिन गुजरात बीजेपी का मुस्लिम चेहरा बनीं युवा नेता आसिफा खान मोदी की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकतीं। बहुत से ऐसे मुस्लिम भी हैं जो गुजरात की विकास गाथा में भागीदार बनना चाहते हैं।
मोदी की अगुवाई में गुजरात के विकास पर शक की गुंजाइश नहीं है। गांवों के विद्युतीकरण से बाबूभाई कोली जैसों की किस्मत बदल गई। गुजरात में निवेश को उद्योगपति हर समय तैयार हैं। महिला उद्योगपतियों के कार्यक्रम में सबने कहा था कि सब मोदी से प्यार करते हैं।
विकास की इस तस्वीर में कुछ दाग भी हैं। अहमदाबाद से महज 200 किलोमीटर दूर पंचमहाल जिले के आदिवासी गांव दारुनिया में बिजली नहीं आती, सड़क नहीं है और पानी की किल्लत बरसों से है। दारुनिया की रहने वाली अनुसूयादेवी दिनेशभाई डोली ने मोदी को फ्रॉड बताया। मोदी के विकास के आलोचकों की भी कमी नहीं है। मुकुल सिन्हा कहते हैं कि मोदी 5 करोड़ गुजराती के नहीं बल्कि 5 करोड़पतियों के लिए काम करते हैं।
लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद मोदा का कद विशालकाय हो चुका है। मोना रावल जैसी युवा उद्यमी मोदी को आदर्श मानते हैं। मोदी का भाषण उन्हें सम्मोहित कर देता है। रावल कहती हैं कि नरेंद्र मोदी जब बोलते हैं तो उनका भाषण सुनकर हम उनपर फिदा हो जाते हैं।
लोकप्रियता की लहरों पर सवार मोदी 3डी इमेज के सहारे एक साथ 50 शहरों में दिखाई देते हैं। क्योंकि महंगी कलाबाजियों से छवि सुधार में मदद मिलती है। सोशल मीडिया पर मोदी की लोकप्रियता का कोई जोड़ नहीं। सोशल मीडिया आर्मी के मोदी सुप्रीम कमांडर हैं। मोदी का तानाशाही रवैया भी बहुत से लोगों को भाता है। आनंद जिले में तमन्ना गांव के सरपंच चंद्रकांत मुखी कहते हैं कि डिक्टेटर तो होना मांगता है ना, नहीं तो ये एमएलए और मिनिस्टर अपना एजेंडा लेकर घुमेंगे और काम नहीं होगा।
सवाल उठता है कि क्या नरेंद्र मोदी इंदिरा गांधी जैसे तानाशाह हैं। क्या मनमोहन सिंह के बरअक्स मोदी निर्णाय क्षमता रखते हैं। गुजरात और संघ का दिल मोदी जीत चुके हैं। लेकिन क्या मोदी देश का दिल जीत पाएंगे। पार्टी में उनके नाम पर तीखी खेमेबंदी है। मोदी में भले ही गजब की संगठन क्षमता हो लेकिन बांटने वाली उनकी छवि भी साथ-साथ चलती है।

