Published On:Wednesday, October 9, 2013
Posted by NJFI media
पढ़ें: मोदी-आडवाणी बनते-बिगड़ते रिश्ते की कहानी
नई दिल्ली। बीजेपी में आज लालकृष्ण आडवाणी का युग आधिकारिक तौर पर खत्म हो गया। जिस तरह से मोदी के आगे आडवाणी की हर मांग को नजरअंदाज कर दिया गया उससे ये बात और साफ हो जाती है। मोदी ने अपने गुरु को ही दरकिनार दिया। लेकिन एक वक्त वो भी था जब आडवाणी ने मोदी की उंगलियां पकड़कर उन्हें सत्ता के गलियारों में चहलकदमी करवाई। उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाई। देखिए पहले मुहब्बत फिर कड़वाहट से भरा ये रिश्ता।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने गुरु को धोबी पाट दिया है। धोबी पाट जिसमें विरोधी चारो खाने चित हो जाता है। और शायद बीजेपी के कुछ नेताओं को अफसोस सिर्फ इस बात का होगा कि चारों खाने चित होने वाले गुरु लालकृष्ण आडवाणी हैं। अब मोदी बीजेपी के भविष्य हैं। और आडवाणी इतिहास। बेटे जैसा रिश्ता रखने वाले मोदी ने ही उन्हें गुजरे जमाने की बात बना दिया। आखिर मोदी आडवाणी का इतना भी सम्मान क्यों नहीं कर पाएं कि पीएम पद की अपनी उम्मीदवारी का ऐलान महज 2 महीने तक रोक ले। जैसा कि आडवाणी चाहते थे। आखिर चेले ने अपने उस गुरु का उतना भी खयाल क्यों नहीं रखा जिसने कई बार उसे मुसीबतों से उबारा है।
मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं रहते अगर 2002 के गुजरात दंगों के बाद उन्हें आडवाणी ने बचाया ना होता। 11 साल पहले गोवा में चल रही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को निकालने की तैयारी पूरी कर ली थी। लेकिन आडवाणी उनके फैसले के बीच में आ गए। वाजपेयी को झुकना पड़ा।
आज नरेंद्र मोदी की महात्वाकांक्षा के आगे आडवाणी की लौह पुरुष की प्रतिमा पिघलती नजर आ रही है। लेकिन यही आडवाणी थे जिन्होंने मोदी की क्षमता पहचानी, और उन्हें अपने साथ आगे बढ़ने का मौका दिया। 1984 में दो सीट मिलने के बाद आडवाणी ने पार्टी की राज्य इकाइयों में ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेट्री के पद को फिर मजबूत किया। गुजरात में मोदी ऑर्गेनाइजिंग सेकरेट्री बने। उन्होंने 1987 में आडवाणी की न्याय यात्रा, 1989 में लोकशक्ति यात्रा, 1990 में अयोध्या रथ यात्रा को सफल बनाने में जी तोड़ मेहनत की।
नरेंद्र मोदी को ईनाम के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर पहली बड़ी जिम्मेदारी मिली। मुरली मनोहर जोशी ने बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर कन्याकुमारी से श्रीनगर तक तिरंगा फहराने के लिए अखिल भारतीय एकता यात्रा की। इसका प्रबंधन मोदी को मिला, जो जबरदस्त प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन कर बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति पर छा गए। बीजेपी में मोदी का उदय हो चुका था। आडवाणी उनके साथ थे। इसके बाद सियासत में 10 साल सीनियर गुजरात बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष शंकर सिंह वाघेला से उनका टकराव शुरू हो गया। जूनियर होने के बावजूद मोदी ने एक तुरुप चाल चलकर पार्टी में उनका कद कम कर दिया।
कहते हैं कि 1991 में आडवाणी को गांधी नगर से चुनाव लड़ने की सलाह मोदी ने ही दी थी। इस सीट से शंकर सिंह वाघेला लड़ते थे। लेकिन नई दिल्ली सीट से राजेश खन्ना के कांग्रेस प्रत्याशी बनने के बाद आडवाणी सेफ सीट तलाश रहे थे। मोदी की ये तुरुप चाल थी क्योंकि तब बेहद लोकप्रिय आडवाणी के गुजरात में आने से कार्यकर्ता उत्साह में भर गए। शंकर सिंह वाघेला पिछड़ते गए।
शंकर सिंह वाघेला मोदी के पहले सियासी शिकार बने जब 1996 में उन्हें पार्टी से जाना पड़ा। 2001 में गुजरात भूकंप के आधे-अधूरे राहत कार्य और दो उप-चुनाव में हार की वजह से केशुभाई की गुजरात के सीएम के तौर पर विदाई हो गई। कहते हैं अक्टूबर 2001 में आडवाणी की वजह से ही मोदी चुनाव लड़े बिना ही सीएम बन गए। एक के बाद एक चुनावी सफलता से उनकी सियासी महत्वाकांक्षा बढ़ती गई। तभी पाकिस्तान यात्रा के दौरान आडवाणी ने जिन्ना को सेकुलर करार दिया। यहीं से रिश्ते में दरार पड़ने लगी।
मोदी-आडवाणी के रिश्ते में कैसे पड़ी दरार?
2005 में जिन्ना पर दिए आडवाणी के बयान की आरएसएस-बीजेपी में जबरदस्त आलोचना हुई। आडवाणी के समर्थन में मोदी नहीं आए, करीब तीन महीने बाद आडवाणी को अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। 2011 में अडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ पोरबंदर से यात्रा निकालना चाहते थे लेकिन मोदी ने सदभावना यात्रा शुरू कर दी। अडवाणी ने अपनी यात्रा मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार के प्रदेश बिहार से की। गोवा कार्यकारिणी से पहले बीजेपी में मोदी को पीएम बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी। आडवाणी ने मोदी की दावेदारी को कमजोर करने की आखिरी कोशिशें की
2009 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में मिली हार के बाद संघ भी मानने लगा था कि पार्टी को नए चेहरे की जरूरत है। इस सोच ने मोदी को मजबूत कर दिया। आखिरकार पहले गोवा, फिर दिल्ली में आडवाणी मोदी के ताजा सियासी शिकार बन गए।

