Published On:Friday, January 17, 2014
Posted by NJFI media
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सैयदना साहब के पिता डॉ. सैयदना ताहेर सैफुद्दीन 51वें धर्मगुरु थे। सैयदना साहब ने अपने वालिद की देखरेख में मजहब की तालीम ली। 13 साल की उम्र में उन्होंने पूरी कुरान याद कर ली थी। जब वे 19 वर्ष के थे तब उनके पिता ने उन्हें वारिस घोषित कर दिया। 1965 में पिता के इंतकाल के बाद वे गद्दीनशीं हुए। उनके सात बेटे और तीन बेटियां हैं।
यमन यात्रा के बाद आए सुर्खियों में
जब सैयदना साहब ने यमन की यात्रा की तो वे समाज के हजारों लोगों से मिले। दाऊदी बोहरा समाज की नींव 400 साल पहले यमन में ही रखी गई थी। कुछ मस्जिदों को देखा। वहां के गणमान्य लोगों से बातचीत की। इसके नतीजतन यमन सरकार ने वहां के बोहराओं को अलग समुदाय की मान्यता प्रदान कर दी। जब सैयदना साहब भारत लौटे तो उन्हें मंसूर उल यमन के खिताब से नवाजा गया। उन्हें काहिरा यूनिवर्सिटी ने डॉक्टरेट ऑफ इस्लामिक स्टडीज़ की उपाधि प्रदान की।


