Published On:Saturday, January 25, 2014
Posted by NJFI media
गण और तंत्र स्वंय में सुधरे
गण और तंत्र स्वंय मंे सुधरेविश्व गुरू भारत बहुआयामी विकृतियों एवं प्रदूषण की चपेट में है। हिन्दुस्तान का विधान, सुसंस्कार, संविधान, सामाजिकता मानसिकता बौद्धिकता, विवेकवादिता तथा लक्ष्य वादिता समाप्त हो रही है। राजा और रंक का चरित्र एक जैसा माना जाता है। गण प्रधान ह उसके लिए ही तंत्र स्थापित है। शाश्वत सत्य है कि गणों का चरित्र विधान संस्कार, नीति, नियत, लक्ष्य, सामाजिकता बौद्धिकता मानसिकता, विवेकवादिता, सच्ची आध्यात्मिकता, तंत्र व उसके कर्णधारों व रचियताओं में विकृत कर दी है तंत्र में राजनेता नौकरशाह, उद्य़ोगपति, पॅंूजीपति एवं व्यापारी वर्ग, नेताशाह, राजनैतिक दल तथा सामाजिक आध्यात्मिक संस्थाए ही है तंत्र तो अति विकृत है स्वार्थी, सत्तावादी एकाधिकार वादी नाटक नौटंकी बाज है और विश्व गुरू भारत को कारपोरेट इन्डिया और बांउ बनाने पर अमादा है। ये घिनौने भारत को देश नहीं अपितु बहु आयामी व्यापार की वस्तु ही मान रहे हैं।
गणतंत्र की 65 वी वर्षगाठ पर हमें गहन चिंतन व मनन कर, देश तथा स्वंय के शाश्वत सत्य से साक्षात्मकार जरूरी है। इस वक्त भारत देश नहीं, अपितु भीड भरा भूखण्ड ही नजर आ रहा हैं। आजादी और गणतंत्र खतरे में है। बहुआयामी गुलामी और लोभतंत्र को ही आजादी और गणतंत्र माना जा रहा है। हर आदमी अपने अपने देश दायित्वों व कर्तव्यों से विमुख है और आजादी व गणतंत्र को विकृत व समाप्त कर रहा हैं।
हिन्दुस्तान अनादि काल से विभिन्नताओं का केन्द्र रहा है। आजादी के पूर्व विभिन्न विशषताओं में और लक्ष्यवादिता में परिवर्तित हुई थी और आज वही विभिन्नताएं क्षेत्रवाद अलगावाद उग्रवाद, नक्सली स्वरूप में परिवर्तित हो चुकी हैं। अनेकता जो एकता स्वरूव में थी वह लूट, स्वार्थ और सत्तावादिता में बदल गई है। जिसका परिणाम कुपरिणाम देश गणतंत्रत्र जनता और व्यवस्था भुगत रही है।
गणतंत्र सुशासन सुव्यवस्था सर्व विकास व विधि राज हेतु स्थापित किया गया था किन्तु उपरोक्त भावना व लक्ष्यों की कू्रर हत्या कर उन्ही के शवां पर बैठकर राजा और रंक श्रेष्ठ शव साधक बन रहे है। देश
विदेशी व स्वदेशी आतंकी, देश आजादी, गणतंत्र लोकतंत्र व व्यवस्थाओं पर भारी पड रहे हैं। विदेशी व स्वदेशी आतंकियों को मेहमान माना जा रहा है। आतंकियों को त्वरित सजा देने में लेतलाली हो रही हैं। संसद आर विधानसभाओं में स्वदेशी आतंकियों की भरमार है। देश के संवाद पालिका भी स्वदेशी आतंकियों के साथ। देश आजादी, गणतंत्र लोकतंत्र कैसे सुरक्षित हैं।
कोहराम मचाना व्यर्थ है समस्या का समाधान जरूरी हैं। देश में नव विधान, संविधान व परिवेश व नवतंत्र की स्थापना जरूरी है। राजा और रंक का चरित्र बदलना जरूरी हैं। सम्पन्नों वंचितों के वर्ग की समाप्ति जरूरी है। धन को साध्य नहीं, साधन मानने की अनिवार्यता हैं। जनभावनाओं को सम्मान देना जरूरी है उसके विचारों व भावनाओं के अनुरूप तंत्र को चलना जरूरी है। गणों को भी लोभवाद पाखण्ड, झूठी सिद्धांतवादिता, अपने मताधिकार को बेचने का चरित्र त्यागना होगा, अपना सर्वस्व बलिदान करने हेतु तैयार रहना हागा। एनजेएफआई ने जनता का महाधिकार पत्र और नव गणतंत्र का नव एजेन्डा प्रस्तुत किया है उसे मूर्तरूप देना होगा। विवेकहीनता स दश, समाज, व्यक्ति व व्यवस्थाओं व आध्यात्म से समाप्त करना होगा। इसके लिए जरूरी है देश का गण और तंत्र स्वंय में देश भक्षक नहीं, देश रक्षक बने। गणतंत्र 2014 नव संकल्पों का समारोह है और अनेकताओं को विशेषताओं में बदलने के संकल्प का महापर्व भी है। गर्व से कहा, हम हिन्दुस्तानी हैं।
दो वर्ग पैदा हुए है। पहला 20 प्रतिशत सुखी सम्पन्नों का और 80 प्रतिशत वंचितों का। 20 प्रतिशत सम्पन्न वर्ग अति चालाक, कुटिल षडयंत्री, सत्ता स्वादु, एकाधिकारवादी, सत्तावादी होकर महाशाषकी व अन्याय स्वरूप में है। 80 प्रतिशत अपना गुलाम मानता है और सत्ता अपहरण के षडयंत्र रचता हैं देश के कर्णधार, नेता, सभीदल उसके बंधुवा मजदूर है। सम्पन्नों व वचितों के बीच अमिट खायी थी किन्तु सत्ता बनाकर सम्पन्नों ने 80 प्रतिशत वंचितों को अपना गुलाम चरणदास व पालकी उठाउ बनाया। वंचितों को सम्पन्न वर्ग भीखारी ही आज भी मानता है। सत्ता सुन्दरी के अपहरण में सहयोग लेने हेतु भोभ रूपी भीख भी कुटिल पूर्वक देता है क्योंकि सत्ता पर तो 20 प्रतिशत ही काबिज है। प्रत्येक दल और नेता चुनावों में लोभतंत्र के लालीपाप नाममात्र दर पर खाद्यान्न धार्मिक यात्राओें एवं अनेक योजनाएं व सुविधाओं की घोषणा कर 80 प्रतिशत वंचितों का शिकार करती है सत्ता सुन्दरी को अपन अंक पाश में बाधते है और धन सभी सुविधाओं का भोग करते हैं। और अपनी तिजोरियों में धन का आयतन बढाते है और 80प्रतिशत जनता पर राज करते हैं। उन्मादवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद भाषावाद हिंसावाद और अराजकतावाद चरम पर हैं।


